ग़ाज़ियाबाद

दो लाइन की पोस्ट, फिर ‘डील’ का दबाव; शराब दुकानों को निशाना बना रहा सोशल मीडिया गैंग!-वीडियो बनाने के बाद ओवररेटिंग की शिकायत, विक्रेताओं ने सोशल मीडिया के कथित शिकायतकर्ताओं पर लगाए गंभीर आरोप 

गाजियाबाद। चुनावी माहौल के साथ त्योहारों की आहट तेज होते ही सोशल मीडिया पर भी एक अलग तरह की हलचल शुरू हो गई है। इस बार निशाने पर लाइसेंसी शराब की दुकानें और उनकी निगरानी करने वाला आबकारी विभाग है। आरोप है कि सोशल मीडिया पर खुद को पत्रकार या समाज सुधारक बताने वाले कुछ लोग शराब दुकानों को निशाना बनाकर पहले वीडियो बनाते हैं, इसके बाद ओवररेटिंग अथवा नियमों के उल्लंघन की शिकायत सोशल मीडिया और आईजीआरएस पर करते हैं। विक्रेताओं का आरोप है कि शिकायत का मकसद कई बार उपभोक्ता की समस्या का समाधान कराने से ज्यादा दुकानदार पर दबाव बनाना होता है। दिलचस्प पहलू यह है कि गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जैसे बड़े जिलों में लाखों की आबादी के बीच शराब दुकानों को लेकर बार-बार शिकायत करने वाले कथित सोशल मीडिया शिकायतकर्ताओं की संख्या बेहद सीमित बताई जा रही है। शिकायतों के पैटर्न को लेकर अब शराब विक्रेताओं ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। शराब विक्रेताओं का कहना है कि यदि किसी दुकान पर ओवररेटिंग हो रही है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शिकायत के नाम पर किसी दुकानदार पर दबाव बनाना भी उचित नहीं है। इसी को लेकर अब विक्रेताओं ने कथित फर्जी शिकायतों के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। गौतमबुद्ध नगर में बुधवार को एक शराब विक्रेता की ओर से कुछ लोगों के खिलाफ शिकायत दी गई, जिसमें ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया गया है। विक्रेता ने आबकारी अधिकारी से मामले की जांच कर वास्तविकता सामने लाने और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की है। विक्रेता का कहना है कि वह विभागीय नियमों का पालन करते हुए कारोबार करना चाहता है। यदि उसके प्रतिष्ठान पर कोई वास्तविक अनियमितता मिलती है तो विभाग कार्रवाई करे, लेकिन सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर बार-बार दबाव बनाना उचित नहीं है। आबकारी विभाग के लिए भी यह स्थिति दोहरी चुनौती बन गई है। एक तरफ वास्तविक उपभोक्ता की शिकायतों का तत्काल समाधान करना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ ऐसी शिकायतों की भी जांच करनी पड़ती है जिनके पीछे निजी विवाद या दबाव बनाने की आशंका जताई जा रही है। सोशल मीडिया शिकायतों ने आम उपभोक्ता को अपनी आवाज उठाने का मजबूत माध्यम दिया है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति या कारोबार को दबाव में लेने के लिए नहीं होना चाहिए। शिकायत में तथ्य, साक्ष्य और शिकायतकर्ता का सहयोग जांच को मजबूत बनाते हैं। त्योहार और चुनावी मौसम में शराब की बिक्री और निगरानी दोनों महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में आबकारी विभाग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। वास्तविक शिकायत पर तत्काल कार्रवाई और फर्जी शिकायत की निष्पक्ष जांच—दोनों के बीच संतुलन ही व्यवस्था में भरोसा कायम कर सकता है। अब देखना यह है कि सोशल मीडिया पर शराब दुकानों को निशाना बनाने की शिकायतों का यह सिलसिला कहां तक पहुंचता है और विभागीय जांच में कितनी शिकायतें वास्तविक तथा कितनी निराधार साबित होती हैं। वर्ष 2026 के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार गौतमबुद्ध नगर की आबादी करीब 19,09,506 है। वहीं गाजियाबाद शहर की अनुमानित आबादी लगभग 24.83 लाख, पूरे गाजियाबाद महानगर क्षेत्र की आबादी करीब 35.78 लाख और जिले की अनुमानित आबादी 50.29 लाख से अधिक बताई गई है। लखनऊ की आबादी भी अलग-अलग 2026 अनुमानों में करीब 40 से 60 लाख के बीच बताई जा रही है। इतनी बड़ी आबादी वाले इन जिलों में हजारों-लाखों उपभोक्ता शराब की दुकानों से खरीदारी करते हैं। इसके बावजूद विक्रेताओं का आरोप है कि सोशल मीडिया पर शराब दुकानों को निशाना बनाकर शिकायत करने वाले कुछ चेहरे बार-बार सामने आते हैं। उनका आरोप है कि इनकी शिकायतें सामान्य ग्राहकों की शिकायतों से अलग पैटर्न वाली होती हैं। विक्रेताओं के अनुसार यदि कोई ग्राहक वास्तव में अधिक कीमत वसूलने या अभद्र व्यवहार से परेशान है तो वह तत्काल संबंधित आबकारी अधिकारी को सूचना दे सकता है। इसके लिए प्रत्येक लाइसेंसी शराब की दुकान के बाहर संबंधित अधिकारी और निरीक्षक का मोबाइल नंबर अंकित किया जाता है। शिकायत मिलते ही विभागीय स्तर पर जांच और आवश्यक कार्रवाई का प्रावधान है। शराब विक्रेताओं का आरोप है कि कुछ कथित सोशल मीडिया शिकायतकर्ता पहले ग्राहक बनकर दुकान पर पहुंचते हैं। वहां शराब खरीदने की प्रक्रिया का वीडियो बनाया जाता है। कई मामलों में ऑनलाइन भुगतान के नाम पर कथित तौर पर अधिक रकम का भुगतान किए जाने का आरोप लगाया गया है। इसके बाद उसी भुगतान का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया अथवा आईजीआरएस शिकायत के साथ लगा दिया जाता है। विक्रेताओं का कहना है कि शिकायतों में अक्सर पव्वे या बीयर की एक कैन पर ओवररेटिंग का आरोप लगाया जाता है। वहीं मौके पर विभागीय अधिकारी जांच के लिए पहुंचते हैं तो शिकायतकर्ता के सामने आने अथवा अपना बयान दर्ज कराने को लेकर स्थिति अलग दिखाई देती है। विक्रेताओं का आरोप है कि जब दुकानदार कथित दबाव में नहीं आता तो सोशल मीडिया पर आबकारी विभाग को भी निशाना बनाया जाता है। हालांकि किसी भी शिकायत की वास्तविकता संबंधित विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। यही वजह है कि विक्रेताओं ने अब शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई है।

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