बचपन छीनती मजबूरी: आखिर क्यों बिहार के कम उम्र के बच्चे दिल्ली के कारखानों तक पहुंच रहे हैं?

एहसान अंसारी
नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली के कई छोटे-बड़े कारखानों, वर्कशॉपों और असंगठित उद्योगों में बिहार से आए कम उम्र के बच्चे काम करते हुए दिखाई देते हैं। जिस उम्र में उनके हाथों में किताबें और कॉपियां होनी चाहिए, उस उम्र में कई बच्चे मशीनों, औजारों और कठिन मेहनत के बीच अपना बचपन बिताने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। बिहार के अनेक गरीब परिवार आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और सीमित आय के कारण अपने बच्चों को कम उम्र में ही काम पर भेजने के लिए विवश हो जाते हैं। कुछ मामलों में बिचौलिये बेहतर रोजगार या अच्छी कमाई का लालच देकर बच्चों को शहरों तक ले आते हैं।
दिल्ली पहुंचने के बाद ये बच्चे अक्सर छोटे कारखानों, सिलाई इकाइयों, पैकिंग, धातु कार्य, प्लास्टिक उद्योग, होटल-ढाबों या अन्य असंगठित क्षेत्रों में लंबे समय तक काम करते हैं। कई बार उन्हें कम मजदूरी, असुरक्षित कार्यस्थल और शिक्षा से दूर रहने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। भारत में बाल श्रम को लेकर कानून मौजूद हैं और सरकार समय-समय पर बचाव एवं पुनर्वास अभियान भी चलाती है। इसके बावजूद गरीबी, जागरूकता की कमी और कानूनों के कमजोर पालन जैसी चुनौतियां इस समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं होने देतीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल कार्रवाई से नहीं, बल्कि गरीब परिवारों को रोजगार, बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और प्रभावी निगरानी व्यवस्था से संभव है। जब तक परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होगी, तब तक कई बच्चों का बचपन मजदूरी की भेंट चढ़ता रहेगा।
बिहार से दिल्ली तक काम की तलाश में आने वाले इन बच्चों की कहानी केवल एक राज्य की नहीं, बल्कि उस सामाजिक और आर्थिक चुनौती की कहानी है, जिस पर सरकार, समाज और उद्योग—सभी को मिलकर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। दिल्ली में कई ऐसे जगह है जहां बड़ी तादाद में बैग कारखाने में छोटे बच्चों को लाकर काम कराया जाता है,
नबी करीम, पहाड़गंज, सोनिया विहार, ओखला,नरेला, करोलबाग, ऐसे कई जगहों पर बच्चों को कारखाने में हर दिन तादाद बढ़ता जाता है।



