ग़ाज़ियाबाद

विश्व ब्रह्मऋषि ब्राह्मण महासभा ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि पर अर्पित किए श्रद्धासुमन, देशभक्ति का लिया संकल्प

गाजियाबाद। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि पर गुरुवार को रेलवे रोड स्थित विश्व ब्रह्मऋषि ब्राह्मण महासभा के तत्वावधान में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी तथा उनके अद्वितीय साहस, देशभक्ति और बलिदान को स्मरण करते हुए राष्ट्र सेवा का संकल्प लिया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महासभा के पीठाधीश्वर ब्रह्मऋषि विभूति बीके शर्मा हनुमान ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई का नाम अदम्य साहस, स्वाभिमान, देशभक्ति और बलिदान का पर्याय है। उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देकर यह सिद्ध कर दिया कि राष्ट्र के सम्मान से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। उनका जीवन आज भी प्रत्येक भारतीय, विशेषकर युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा का अमिट स्रोत है। उन्होंने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। बचपन में उनका नाम मणिकर्णिका (मनु) था। प्रारंभ से ही वे साहसी, निर्भीक और स्वाभिमानी थीं। घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला में उनकी अद्भुत दक्षता ने उन्हें एक असाधारण योद्धा के रूप में स्थापित किया। झाँसी के महाराजा गंगाधर राव से विवाह के बाद वे झाँसी की रानी बनीं, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें केवल एक महारानी नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी प्रतीक बना दिया। बीके शर्मा हनुमान ने कहा कि वर्ष 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। जब अंग्रेजों ने झाँसी पर कब्जा करने का प्रयास किया तो रानी लक्ष्मीबाई ने पूरे साहस और दृढ़ निश्चय के साथ उनका सामना किया। उनका अमर उद्घोष  ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी’ आज भी राष्ट्रभक्ति और आत्मसम्मान की सबसे बुलंद आवाज के रूप में देशवासियों को प्रेरित करता है। उन्होंने अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर युद्धभूमि में जिस वीरता का परिचय दिया, वह भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा। उन्होंने आगे कहा कि 18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटा-की-सराय में युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति प्राप्त की, लेकिन उनका बलिदान भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में नई चेतना का आधार बना। उनके संघर्ष ने असंख्य क्रांतिकारियों को प्रेरित किया और महिलाओं की शक्ति, नेतृत्व क्षमता तथा राष्ट्रप्रेम का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी मिसाल विश्व इतिहास में बहुत कम देखने को मिलती है। श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई का जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढिय़ों के लिए प्रेरणा का जीवंत संदेश है। उन्होंने देश की एकता, अखंडता और सम्मान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी उनके आदर्शों-साहस, स्वाभिमान, नारी सम्मान, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति-को अपने जीवन में अपनाकर समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाए। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उनके अमर बलिदान को नमन किया। इस अवसर पर उपस्थित वक्ताओं ने प्रसिद्ध पंक्ति  ‘खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थीÓ का स्मरण करते हुए कहा कि यह केवल कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि भारत की वीरता, नारी शक्ति और स्वतंत्रता के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है। श्रद्धांजलि सभा में डॉ. एन.एस. तोमर, आर.पी. शर्मा, मिलन मंडल, सुनीता बहस, नरेंद्र कुमार, मदनलाल बढ़वार, एस.पी. सिंह, फुरकान, दिलीप कुमार, रंजीत पोद्दार, मुकेश कुमार, श्यामलाल सरकार, एम.के. सामानिया, सोमल विश्वास सहित बड़ी संख्या में समाजसेवी, प्रबुद्धजन एवं देशभक्त नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान को नमन करते हुए राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने और उनके आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। उपस्थित लोगों ने एक स्वर में कहा कि रानी लक्ष्मीबाई का अद्वितीय शौर्य, राष्ट्रप्रेम और बलिदान आने वाली पीढिय़ों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा तथा उनका नाम भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में सदैव अमर रहेगा।

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