विशेष रिपोर्ट: इलाज नहीं, ये तो खुली लूट है!

गाजियाबाद में डॉक्टरों की फीस का ‘माफिया राज’: ₹200 से सीधे ₹2000! क्या सो रहा है स्वास्थ्य विभाग?
कंसल्टेशन ₹700, इमरजेंसी ₹1400 और होम विजिट के ₹2000… आम आदमी की जेब पर डाका।
नंबर पहले लगाने का ‘कंपाउंडर कट’: आवाज उठाने पर मरीजों से बदसलूकी और गाली-गलौज।
कट-प्रैक्टिस का खेल: मनमाने टेस्ट और महंगे पैथोलॉजी लैब से कमीशन का तगड़ा नेक्सस।
इनकम टैक्स की आंखों में धूल: न कोई पक्की रसीद, न कोई हिसाब-सालाना करोड़ों की काली कमाई।
ललित शर्मा, गाजियाबाद
क्या इस देश में बीमार पड़ना अब कोई ऐसा गुनाह हो गया है जिसकी सजा सिर्फ तबाही और कंगाली है? यदि आप गाजियाबाद में रहते हैं और आपके परिवार में कोई बीमार पड़ जाए, तो अस्पताल जाने से पहले अपनी जेब का वजन नाप लीजिए। गाजियाबाद में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर एक ऐसा संगठित ढांचा खड़ा हो चुका है, जहां मरीजों की मजबूरी का सौदा हर रोज खुलेआम होता है।
कभी ₹200 रुपये में परामर्श देने वाले डॉक्टरों की फीस आज 10 गुना तक बढ़कर आसमान छू रही है। लेकिन सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि गाजियाबाद का स्वास्थ्य विभाग और मुख्य चिकित्सा अधिकारी क्या अपनी आंखें मूंदकर किसी बड़े अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं?
फीस का नया गणित, इलाज या जेब पर डकैती?
गाजियाबाद के पॉश इलाकों से लेकर सामान्य कॉलोनियों तक, क्लिनिक चला रहे डॉक्टरों और निजी अस्पतालों ने अपनी फीस का ऐसा ‘टैरिफ चार्ट’ तैयार कर लिया है, जिसे देखकर कोई भी सामान्य नागरिक दहल जाए
सेवा का प्रकार पहले की औसतन फीस वर्तमान मनमानी फीस वृद्धि का प्रतिशत
सामान्य कंसल्टेशन ₹150 – ₹200 ₹700 350% से अधिक
इमरजेंसी परामर्श ₹300 – ₹400 ₹1,400 350% से अधिक
होम विजिट फीस ₹500 ₹2,000 400%
यह तो सिर्फ टेबल पर बैठने की फीस है। दवाई, जांच और अन्य चार्ज अलग से हैं। एक दिहाड़ी मजदूर या मध्यमवर्गीय व्यक्ति, जो महीने के 15 से 20 हजार रुपये कमाता है, वह अगर दो बार किसी डॉक्टर के क्लिनिक चला जाए, तो उसकी आधी कमाई सिर्फ पर्चा बनवाने में निकल जाती है।
टैक्स कानून की हकीकत: GST और Income Tax का घालमेल
कई लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि डॉक्टरों की फीस पर GST क्यों नहीं लगता। कानूनी और तकनीकी हकीकत ये है कि भारत में जीएसटी (GST) अधिनियम के तहत स्वास्थ्य सेवाओं को जीएसटी से छूट प्राप्त है। यानी डॉक्टर अपनी फीस पर मरीज से जीएसटी नहीं वसूलते।
लेकिन यहीं से शुरू होता है असली ‘काली कमाई’ का खेल!
जब सेवाओं पर जीएसटी नहीं है, तो डॉक्टर को हर मरीज को दी गई सेवा का पारदर्शी हिसाब रखना चाहिए। परंतु गाजियाबाद के अधिकतर क्लिनिकों में
कच्चे पर्चे का खेल: मरीज को फीस देने के बाद कोई पक्की GST/TIN नंबर वाली टैक्स रसीद या लीगल इनवॉइस नहीं दी जाती। एक सादे कागज के टुकड़े पर दवाइयां लिख दी जाती हैं।
कैश में वसूली: फीस का 90% हिस्सा सिर्फ नकद के रूप में लिया जाता है ताकि इसे खातों में दर्शाया ही न जा सके।
इनकम टैक्स की चोरी: जब नकद कमाई का कोई रिकॉर्ड नहीं बनता, तो यह सीधे तौर पर आयकर अधिनियम का उल्लंघन है। रोजाना 50 से 100 मरीज देखने वाले डॉक्टर प्रतिदिन ₹50,000 से ₹1,000,000 तक नकद वसूलते हैं, जिसका बड़ा हिस्सा ब्लैक मनी बन जाता है। क्या इनकम टैक्स विभाग का ‘इन्वेस्टिगेशन विंग’ कभी इन ऐसी क्लिनिकों के बाहर खड़ी लंबी कतारों और नकद के लेन-देन की सुध लेगा?
‘कंपाउंडर कट’ और नंबर गेम: दलाली का अड्ड
यदि आप सोचते हैं कि फीस चुकाकर आपको सही समय पर इलाज मिल जाएगा, तो आप मुगालते में हैं। गाजियाबाद के एक बड़े क्लिनिक का नजारा ये होता है कि बाहर मरीजों की भारी भीड़ लगी है। कोई दर्द से तड़प रहा है तो किसी बुजुर्ग की सांसें फूल रही हैं। ऐसे में क्लिनिक का कंपाउंडर ‘मसीहा’ और ‘माफिया’ दोनों की भूमिका में आ जाता है।
पैसे दो, नंबर पहले पाओ: अगर आपको डॉक्टर के पास तुरंत जाना है, तो नियम-कानून ताक पर रख दिए जाते हैं। कंपाउंडर को ₹200 या ₹500 की ‘चाय-पानी’ दीजिए, और आपका नंबर सीधे टॉप पर आ जाएगा।
विरोध करने पर बदसलूकी: जब कोई शरीफ मरीज या उसका रिश्तेदार इस पक्षपात पर सवाल उठाता है, तो कंपाउंडर और क्लिनिक का स्टाफ मिलकर उसके साथ अभद्रता करता है। यहां तक कि इलाज न करने और बाहर निकालने की धमकियां दी जाती हैं।
डॉक्टर की मौन सहमति: सबसे शर्मनाक बात ये है कि, डॉक्टर को अपने इस स्टाफ के कारनामों की पूरी जानकारी होती है। सालों से जमे ये कंपाउंडर डॉक्टर के ‘कैश मैनेजर’ होते हैं। डॉक्टर को पता होता है कि कंपाउंडर की इस ऊपरी कमाई से क्लिनिक का माहौल भले खराब हो, लेकिन उनका अपना आर्थिक हित सध रहा है।
‘कट-प्रैक्टिस’ और अनपेक्षित टेस्ट्स का मकड़जाल
डॉक्टर की फीस तो बस पहला झटका है। क्लिनिक में कदम रखते ही मरीज को ‘जांच के मकड़जाल’ में फंसाया जाता है। हल्का सा बुखार है? ब्लड टेस्ट कराओ, सीटी स्कैन कराओ, अल्ट्रासाउंड कराओ और हां… जांच सिर्फ उसी XYZ डायग्नोस्टिक सेंटर से होनी चाहिए, ये कोई डॉक्टर का परामर्श नहीं, बल्कि कमीशनखोरी की एक सुव्यवस्थित चेन है।
30% से 50% का कट: डॉक्टर जिस डायग्नोस्टिक लैब का नाम लिखकर देते हैं, वहां से उन्हें हर जांच पर 30 से 50 फीसदी तक का कमीशन सीधे उनके खातों या नकद में पहुंचता है।
ब्रांडेड दवाओं का दबाव: पर्चे पर ऐसी दवाएं लिखी जाती हैं जो केवल क्लिनिक के नीचे बनी खास केमिस्ट शॉप पर ही मिलती हैं। जेनेरिक और सस्ती दवाओं का नाम लिखना तो जैसे डॉक्टरों ने अपने धर्म के खिलाफ मान लिया है।
स्वास्थ्य विभाग का निकम्मापन: कुंभकर्णी नींद में प्रशासन
अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर, गाजियाबाद का स्वास्थ्य विभाग और सीएमओ ऑफिस क्या कर रहा है? क्या स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को क्लिनिकों के बाहर लगे मनमाने फीस के बोर्ड नहीं दिखते? या फिर सब कुछ जानकर अनजान बने रहने का कोई बहुत बड़ा नजराना इन तक नियमित रूप से पहुंच रहा है?
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट का उल्लंघन: नियम कहते हैं कि हर क्लिनिक और अस्पताल को अपनी फीस, सेवाओं की दरें और डॉक्टरों की योग्यता का बोर्ड स्वागत कक्ष पर स्पष्ट रूप से लगाना अनिवार्य है। लेकिन गाजियाबाद में इसका पालन शून्य के बराबर है।
शिकायत निवारण प्रणाली की मौत: यदि कोई मरीज अत्यधिक फीस या अभद्रता की शिकायत लेकर स्वास्थ्य विभाग जाता है, तो फाइलें धूल फांकती रहती हैं। कोई कड़ा निरीक्षण नहीं होता, किसी क्लिनिक का लाइसेंस रद्द नहीं किया जाता।
लापरवाही का आलम: सरकारी अस्पतालों में भीड़ की वजह से मजबूरन आम जनता को इन प्राइवेट धन्वंतरियों की शरण में जाना पड़ता है। क्या स्वास्थ्य विभाग जानबूझकर प्राइवेट मेडिकल लॉबी को फलने-फूलने का मौका दे रहा है?
यह सिर्फ गाजियाबाद नहीं, पूरे देश का नासूर है गाजियाबाद तो बस एक बानगी है। दिल्ली-एनसीआर से लेकर देश के छोटे-छोटे जिलों तक, चिकित्सा अब ‘सेवा’ नहीं बल्कि ‘शुद्ध मुनाफा कमाने वाला कॉरपोरेट धंधा’ बन चुकी है। जब तक चिकित्सा सेवाओं को केवल बाजार के भरोसे छोड़ा जाएगा, तब तक देश की एक बड़ी आबादी सिर्फ एक बीमारी के कारण गरीबी रेखा के नीचे धकेल दी जाएगी। एक गरीब बाप अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए अपनी जमीन, गहने और जीवन भर की पूंजी दांव पर लगाने को मजबूर है।
क्या होना चाहिए सुधार? ठोस कानूनी और प्रशासनिक कदम
यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह हैं, तो उन्हें तुरंत कड़े कदम उठाने होंगे:
क) कानूनी ढांचा और सख्त नियम
फीस की ऊपरी सीमा: सरकार को डॉक्टरों की शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के आधार पर फीस की एक अधिकतम सीमा तय करनी चाहिए। ₹700 और ₹2000 जैसी मनमानी वसूली पर तुरंत रोक लगे।
अनिवार्य डिजिटल बिलिंग: हर क्लिनिक के लिए डिजिटल बिलिंग और आयकर से जुड़ा पैन/टैन दर्ज करना अनिवार्य किया जाए। हर मरीज को पक्की प्रिंटेड रसीद मिलना उसका कानूनी अधिकार बने।
ख) अस्पतालों और क्लिनिकों में व्यवस्थागत सुधार
टोकन और डिजिटल डिस्प्ले सिस्टम: कंपाउंडरों के ‘कट-सिस्टम’ को खत्म करने के लिए हर क्लिनिक में डिजिटल टोकन सिस्टम अनिवार्य किया जाए, जहां स्क्रीन पर मरीज का नंबर दिखे।
CCTV और शिकायत बॉक्स: क्लिनिक के रिसेप्शन और वेटिंग एरिया में सीसीटीवी कैमरे और स्वास्थ्य विभाग का एक सीधा ‘क्यूआर कोड/हेल्पलाइन नंबर’ बोर्ड पर लिखा हो, ताकि अभद्रता या अवैध वसूली की शिकायत तुरंत दर्ज हो सके।
ग) स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही
निजी क्लिनिकों का सरप्राइज ऑडिट: सीएमओ फ्लाइंग स्क्वाड बनाए जो बिना बताए क्लिनिकों में जाकर फीस बोर्ड, बिलिंग प्रक्रिया और मरीजों की सुविधाओं का औचक निरीक्षण करे।
कमीशनखोरी पर बैन: ‘कट-प्रैक्टिस’ में संलिप्त पाए जाने वाले डॉक्टरों का मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन रद्द करने की व्यवस्था बने।
डॉक्टर को समाज में ‘भगवान का दर्जा’ दिया गया है। लेकिन जब भगवान ही सौदागर बन जाए और व्यवस्था उसकी ढाल बन जाए, तो जनता कहां जाए? गाजियाबाद की जनता अब तंग आ चुकी है। स्वास्थ्य विभाग और आयकर विभाग को अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागनी होगी। अगर अब भी इन बेलगाम डॉक्टरों और उनके गुर्गों पर लगाम नहीं कसी गई, तो जनता का इस पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा। सवाल साफ है, क्या शासन-प्रशासन में इतना साहस है कि वह इस मेडिकल माफिया के गिरेबान पर हाथ डाल सके?



