ग़ाज़ियाबाद

पेट्रोल-डीजल महंगे होते ही सीमेंट, सरिया और ईंटों की कीमतों में उछाल, प्रोजेक्ट लागत पर बढ़ा 5% तक दबाव -कमर्शियल रियल एस्टेट और ऑफिस स्पेस पर भी दिखेगा महंगाई का असर

नई दिल्ली/गाजियाबाद। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर अब रियल एस्टेट सेक्टर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। प्रदीप गुप्ता, राष्ट्रीय अध्यक्ष व्यापारी एकता समिति संस्थान ने कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि केवल परिवहन खर्च तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका प्रभाव पूरे रियल एस्टेट इकोसिस्टम पर पड़ता है। निर्माण लागत से लेकर प्रॉपर्टी की मांग और निवेश के पैटर्न तक हर स्तर पर बदलाव देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि तेल महंगा होने का सबसे पहला असर निर्माण लागत पर पड़ता है। सीमेंट, सरिया, रेत और गिट्टी जैसे निर्माण सामग्री के उत्पादन और परिवहन में भारी मात्रा में ईंधन का उपयोग होता है। डीजल की कीमत बढऩे से ट्रांसपोर्ट लागत सीधे बढ़ जाती है, जिससे निर्माण सामग्री महंगी हो जाती है। ईंट-भट्टे भी मुख्य रूप से कोयला और डीजल पर निर्भर होते हैं, जिसके कारण ईंटों की कीमतों में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। विशेषज्ञों के अनुसार डीजल के दाम में प्रति लीटर 10 रुपये की बढ़ोतरी किसी भी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट की कुल लागत को 3 से 5 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। प्रदीप गुप्ता ने कहा कि बढ़ती लागत के कारण डेवलपर्स को या तो प्रोजेक्ट की कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं या फिर कई परियोजनाओं को अस्थायी रूप से रोकने की स्थिति बन जाती है। इसका सीधा असर घर खरीदने वाले आम नागरिकों पर पड़ता है, क्योंकि मकानों की कीमतों में बढ़ोतरी होना लगभग तय माना जाता है। तेल कीमतों में वृद्धि का दूसरा बड़ा असर रियल एस्टेट की लोकेशन डिमांड पर पड़ता है। शहर से दूर विकसित हो रहे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का दैनिक फ्यूल खर्च बढ़ जाता है, जिससे आउटर एरिया की मांग कमजोर पडऩे लगती है। गुरुग्राम, नोएडा एक्सटेंशन और यमुना एक्सप्रेसवे जैसे क्षेत्रों में प्रॉपर्टी की खरीदारी पर दबाव देखने को मिल सकता है। इसके विपरीत, सिटी सेंटर, मेट्रो स्टेशन और ऑफिस हब के नजदीक स्थित आवासीय परियोजनाओं की मांग तेजी से बढऩे लगती है। लोग अब ऐसे घरों को प्राथमिकता देने लगे हैं जहां  ‘वॉक-टू-वर्क’ या कम दूरी में ऑफिस पहुंचने की सुविधा उपलब्ध हो। उन्होंने यह भी बताया कि बड़े इंटीग्रेटेड टाउनशिप, जहां आवास, स्कूल, ऑफिस, शॉपिंग और मनोरंजन की सुविधाएं एक ही परिसर में उपलब्ध हों, उनकी लोकप्रियता तेल महंगा होने के बाद और बढ़ जाती है। इससे शहरी विकास की दिशा भी बदलती दिखाई देती है। कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर भी इससे अछूता नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट लागत बढऩे से कंपनियां शहर के बाहरी इलाकों की बजाय शहर के पास छोटे वेयरहाउस और लॉजिस्टिक स्पेस लेना पसंद करती हैं। बढ़ते फ्यूल खर्च के कारण लोग अनावश्यक आवाजाही कम करते हैं, जिससे मॉल और रिटेल स्पेस का फुटफॉल घट सकता है और रेंटल यील्ड पर दबाव बढ़ता है। कई कंपनियां कर्मचारियों के खर्च कम करने के लिए हाइब्रिड या वर्क फ्रॉम होम मॉडल अपनाने लगती हैं, जिससे बड़े ऑफिस स्पेस की मांग धीमी पड़ सकती है। प्रदीप गुप्ता ने कहा कि पहले से बढ़ती महंगाई के बीच तेल की कीमतों में तेजी ने रियल एस्टेट सेक्टर के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। आने वाले समय में डेवलपर्स, निवेशकों और खरीदारों सभी को बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बनानी होगी। उनका मानना है कि ऊर्जा लागत में स्थिरता आने तक रियल एस्टेट बाजार में लागत दबाव और मांग के नए ट्रेंड जारी रह सकते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button