गाजियाबाद पुलिस की लापरवाही, क्या पत्रकार की हत्या के बाद जागेगा कविनगर थाना?
गाजियाबाद: क्या यूपी में ‘कलम’ सुरक्षित है? क्या पुलिस किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रही है? गाजियाबाद के थाना कविनगर से जो मामला सामने आया है, उसने कमिश्नरेट पुलिस के दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक तरफ सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करते हैं, वहीं कविनगर पुलिस के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।
कविनगर पुलिस की ‘कुंभकर्णी’ नींद, पत्रकार की जान पर संकट
एक पीड़ित, जो पेशे से पत्रकार है, पिछले 1 महीना 10 दिन से थाने की चौखट घिस रहा है। मामला धोखाधड़ी और षड्यंत्र का है, जिसकी शिकायत 6 april तारीख को ही दे दी गई थी। हैरानी की बात यह है कि पीड़ित ने पुलिस को ऑडियो रिकॉर्डिंग और पुख्ता लिखित दस्तावेज सौंप दिए हैं, लेकिन ‘हाईटेक’ होने का दावा करने वाली कविनगर पुलिस को FIR लिखने की फुर्सत नहीं मिली।
कमिश्नर के आदेश भी बेअसर, रसूख के आगे झुकी खाकी?
सवाल खड़ा होता है कि आखिर कविनगर पुलिस पर किसका दबाव है? पीड़ित ने दो बार पुलिस कमिश्नर से गुहार लगाई, वहां से भी निर्देश आए, लेकिन कविनगर थाने के दरोगा और अफसर अपनी ही धुन में मस्त हैं। जब कमिश्नर के आदेश की कोई कीमत नहीं, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे?
‘राजा भैया’ की बहन के नाम पर धमकी, मूकदर्शक बनी पुलिस
पुलिस की सुस्ती ने आरोपियों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि अब पीड़ित को सरेआम जान से मारने की धमकी दी जा रही है। आरोपी ने पीड़ित को फोन कर यूपी के बाहुबली नेता राजा भैया की बहन का नाम लेकर धमकाया है। यह सीधे तौर पर एक पत्रकार की आवाज को दबाने की कोशिश है। क्या कविनगर पुलिस इन रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो चुकी है?
बड़ा सवाल: क्या मर्डर के बाद दर्ज होगी FIR?
पीड़ित अब खौफ के साये में जीने को मजबूर है। कविनगर पुलिस की यह ‘नाकामी’ इशारा कर रही है कि शायद उन्हें किसी पत्रकार की लाश गिरने का इंतजार है। क्या गाजियाबाद में कानून का राज खत्म हो चुका है? अगर एक महीने से ज्यादा समय में सबूत होने के बावजूद FIR दर्ज नहीं हुई, तो यह पुलिसिया तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है।



