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मेरठ सेंट्रल मार्केट मामला: 1989 की अनियमितता से सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक, अब ध्वस्तीकरण की बाध्यता

कई स्तरों पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण के आरोप

योगी सरकार ने प्रभावितों को दिए थे तीन विकल्प, नहीं बनी सहमति

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी राहत का रास्ता तलाशने में जुटी सरकार

उज्जवल रस्तौगी वरिष्ठ पत्रकार

मेरठ। मेरठ के सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण का मामला एक दिन में नहीं बना, बल्कि इसकी जड़ें वर्ष 1989 तक जाती हैं। समय के साथ यह प्रकरण कई स्तरों पर भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और राजनीतिक हीला-हवाले के आरोपों से घिरता रहा। अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक पहुंच चुका है, तो ध्वस्तीकरण की कार्रवाई अनिवार्य हो गई है। हालांकि, राज्य सरकार अब भी प्रभावितों को राहत दिलाने के लिए न्यायिक रास्ते तलाशने में जुटी है।

इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए, जबकि सरकार का दावा है कि उन्होंने शुरुआत से ही प्रभावितों के हित में समाधान निकालने का प्रयास किया। सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों से मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री योगी की ओर से प्रभावितों को तीन विकल्प दिए गए थे, ताकि उन्हें नुकसान से बचाया जा सके और कानूनी जटिलताओं के बीच कोई व्यवहारिक रास्ता निकले।

सरकार ने व्यापारियों को दिए थे तीन विकल्प
पहले विकल्प के तहत प्रभावितों से कहा गया था कि वे स्वयं सरकार के साथ मिलकर पक्षकार बनें, जिससे न्यायालय में उनका पक्ष मजबूत हो सके। दूसरे विकल्प में आवास विकास विभाग द्वारा निर्धारित कंपाउंडिंग शुल्क जमा करने की सलाह दी गई थी, ताकि नियमों के अनुरूप समाधान खोजा जा सके और ध्वस्तीकरण को रोक जा सके। तीसरा विकल्प यह था कि सुप्रीम कोर्ट के संभावित रुख को ध्यान में रखते हुए सेंट्रल मार्केट को छोड़ने का निर्णय लिया जाए और सरकार की पुनर्वास योजना को स्वीकार किया जाए, जिसके तहत सभी प्रभावितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकार उठाने को तैयार थी।

नहीं बन पाई सहमति
हालांकि, इन तीनों विकल्पों पर सहमति नहीं बन सकी। इसके चलते मामला पूरी तरह न्यायालय के अंतिम निर्णय पर निर्भर हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने नियमों और कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए जब ध्वस्तीकरण का आदेश दिया, तो प्रशासन के सामने इसे लागू करने की अपरिहार्य स्थिति बन गई।

सरकारों ने दिया अप्रत्यक्ष तौर पर संरक्षण
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी यह मुद्दा लगातार चर्चा में है। आरोप हैं कि पूर्ववर्ती सरकारों जनता दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कार्यकाल में इस तरह के निर्माणों को न केवल नजरअंदाज किया गया, बल्कि कई मामलों में अप्रत्यक्ष तौर पर संरक्षण भी मिला। विशेष रूप से वर्ष 2013 से 2017 के बीच ऐसे उदाहरण सामने आए, जिनमें नियमों को दरकिनार कर निर्माण कार्य होते रहे। अब वही पक्ष वर्तमान सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि सरकार खुद को प्रभावितों के पक्ष में खड़ा बता रही है।

सवालों के घेरे में लोकेश खुराना की भूमिका
मामले में कुछ व्यक्तियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनमें लोकेश खुराना जैसे नामों का उल्लेख किया जा रहा है, जिन पर जनहित याचिकाओं के माध्यम से ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर लाभ लेने के आरोप लगते रहे हैं।

अब भी कानूनी विकल्प तलाशने में जुटी है राज्य सरकार
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद सेंट्रल मार्केट का ध्वस्तीकरण टलना संभव नहीं दिख रहा, लेकिन राज्य सरकार अब भी कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर ऐसे विकल्पों की तलाश में जुटी है, जिससे प्रभावितों को अधिकतम राहत मिल सके। वर्षों पुराने इस विवाद का समाधान अब कानून के दायरे में ही तय होगा, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को कम करने की चुनौती सरकार के सामने बनी हुई है।

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