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आवास विकास परिषद की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, ‘मेला’ लगाने के नाम पर करोड़ों की विवादित भूमि पर कब्जे की कोशिश का आरोप

मथुरा। थाना जैंत क्षेत्र के अंतर्गत छटीकरा स्थित चारधाम मंदिर के पास एक रिक्त भूमि इन दिनों विवादों का अखाड़ा बन गई है। उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद के अधिकारियों पर आरोप लगा है कि उन्होंने न्यायालय में विचाराधीन एक विवादित भूमि पर नियमों को ताक पर रखकर मेला लगाने की अनुमति प्रदान की। इस कदम ने न केवल स्थानीय निवासियों के आक्रोश को भड़का दिया है, बल्कि विभाग की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, आवास विकास परिषद ने वृंदावन रोड स्थित एक खाली पड़ी भूमि पर दो माह के लिए मेला लगाने की अनुमति जारी की थी। इसके लिए अनुमति धारक से 15,55,155 रुपये की राशि भी जमा कराई गई। 13 फरवरी को आवास विकास परिषद के वरिष्ठ स्टॉफ ऑफिसर राकेश चंद्र द्वारा इस आशय का पत्र जारी किया गया। अनुमति मिलते ही ठेकेदार अपने कर्मचारियों के साथ भूमि पर बांस-बल्ली लगाकर मेले की तैयारी करने पहुंच गया।
स्थानीय निवासियों का भारी विरोध जैसे ही भूमि पर कब्जा लेने और बांस गाड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई, स्थानीय लोग लामबंद हो गए। लोगों का गुस्सा इस बात पर भड़का कि जिस भूमि का मामला न्यायालय में विचाराधीन है, उस पर परिषद ने व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति कैसे दे दी। स्थानीय निवासी हेमंत ने सीधे तौर पर परिषद के अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि अनुमति धारक ने सिटी मजिस्ट्रेट से भी आवश्यक अनुमति नहीं ली थी और वह केवल विभाग के कुछ अधिकारियों की ‘दबंगई’ के दम पर काम शुरू कर रहा था। स्थानीय लोगों के जबरदस्त विरोध के बाद ठेकेदार के कर्मचारी मौके से भाग खड़े हुए। आरोप है कि जब यह खबर आवास विकास परिषद के अधीक्षण अभियंता अतुल कुमार सिंह तक पहुंची, तो उन्होंने इस विरोध को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया।
25 फरवरी को विभाग की टास्क फोर्स, जिसमें अवर अभियंता नवीन यादव और सहायक अभियंता कृपांशु द्विवेदी शामिल थे, जेसीबी मशीनों के साथ मौके पर पहुंचे। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह पूरी कार्यवाही केवल जनता में भय व्याप्त करने के लिए एक ‘सुनियोजित ड्रामा’ थी।
“मौके पर कोई अतिक्रमण था ही नहीं, जिसे हटाया जाए। अधिकारियों ने केवल प्रेस नोट जारी कर सुर्खियां बटोरने के लिए यह दावा किया कि उन्होंने करोड़ों की भूमि से अतिक्रमण मुक्त कराया है, जबकि असलियत में वे मेले के नाम पर भ्रष्टाचार कर अपनी जेबें भरना चाह रहे थे।” — हेमंत, स्थानीय निवासी
अधिकारियों की चुप्पी और बढ़ता तनाव
इस पूरे प्रकरण में आवास विकास परिषद के अधीक्षण अभियंता और अन्य अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यदि भूमि विवादित है, तो उस पर किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति देना नियम विरुद्ध है। वर्तमान में क्षेत्र में तनाव व्याप्त है और स्थानीय लोग इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जिला प्रशासन इस ‘मेला आवंटन’ के पीछे के खेल की जांच कराता है या फिर रसूखदार अधिकारियों की फाइलों के नीचे यह मामला दबकर रह जाएगा।

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