ग़ाज़ियाबाद

लोनी के 50 शैय्या अस्पताल में बाहर के महंगे टेस्ट लिखने का आरोप-मासूम के दस्त के इलाज में बाहर की लैब और मेडिकल स्टोर भेजा गया पिता

गाजियाबाद। लोनी स्थित 50 शैय्या सरकारी अस्पताल में इलाज अब आम मरीजों के लिए महंगा साबित होने लगा है। सरकारी अस्पताल में मुफ्त या सस्ती चिकित्सा सुविधा मिलने की उम्मीद लेकर पहुंचे मरीजों को निजी अस्पतालों जैसी व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है। ताजा मामला तब सामने आया जब दांत निकलने के दौरान दस्त से पीडि़त डेढ़ वर्षीय बच्चे के इलाज के लिए पहुंचे पिता को चिकित्सक ने बाहर से महंगे टेस्ट और दवाइयां लिख दीं। नाईपुरा निवासी दीपक कुमार मंगलवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे अपने डेढ़ वर्षीय बेटे ओम को लेकर 50 शैय्या अस्पताल पहुंचे। उन्होंने एक रुपये का पर्चा बनवाया और 33 नंबर कक्ष में चिकित्सक को बच्चे को दिखाया। चिकित्सक ने जांच के बाद कुछ दवाइयां लिखीं और बताया कि कुछ दवाइयां अस्पताल की डिस्पेंसरी से मिल जाएंगी, जबकि बाकी दवाइयां बाहर के मेडिकल स्टोर से खरीदनी होंगी। आरोप है कि चिकित्सक ने पर्चे के पीछे कुछ टेस्ट भी लिखे और बच्चे के पिता को अस्पताल के सामने स्थित निजी लैब से जांच कराने के लिए भेज दिया। चिकित्सक ने कहा कि टेस्ट रिपोर्ट दिखाने के बाद ही आगे इलाज किया जाएगा। दीपक कुमार जब लैब पर पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि दोनों जांचों का खर्च करीब 2200 रुपये आएगा। काफी मोलभाव के बाद लैब संचालक 1600 रुपये में टेस्ट करने को तैयार हो गया, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते पिता जांच नहीं करा सके और बिना दवा लिए ही बच्चे को लेकर घर लौटना पड़ा। जानकारी के अनुसार 50 शैय्या अस्पताल में खुद की लैब मौजूद है, जहां अधिकांश जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके बावजूद मरीजों को बाहर से जांच लिखना नियमों के खिलाफ माना जाता है। सरकारी अस्पतालों में निजी लैब से टेस्ट लिखना पूरी तरह प्रतिबंधित है, फिर भी ऐसा होना चिकित्सकों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामला मीडिया के माध्यम से सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आ गया है। कार्यवाहक मुख्य जिला चिकित्साधिकारी अमित विक्रम ने कहा कि अस्पताल में बाहर से टेस्ट लिखने की शिकायत मिली है। पूरे मामले की जांच कराई जाएगी और दोषी पाए जाने वाले चिकित्सक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकारी अस्पतालों में इस तरह की घटनाएं गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही हैं। इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले मरीज यदि आर्थिक कारणों से उपचार से वंचित होने लगें तो स्वास्थ्य व्यवस्था की मंशा पर ही सवाल उठना स्वाभाविक है।

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