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प्याज की राजनीति / प्याज की माला पहनकर घूमी थीं इंदिरा गांधी; 3-3 मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी सत्ता नहीं बचा पाई थी भाजपा

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1977 से 1980 में जनता पार्टी की सरकार में प्याज की कीमतें काफी बढ़ गई थीं, 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था

मई 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पोखरण में परमाणु परीक्षण हुआ, लेकिन प्याज की बढ़ती कीमतों के कारण दिल्ली-राजस्थान में सरकार नहीं बचा सके

मोदी सरकार ने प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए इसके निर्यात पर रोक लगाई, विदेश से 1 लाख मीट्रिक टन प्याज खरीदने का फैसला किया

नई दिल्ली. देश के कई हिस्सों में प्याज की कीमतें 100 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। विपक्ष लगातार सरकार पर सवाल उठा रहा है। ऐसा पहली बार नहीं है, जब प्याज के दाम केंद्र या किसी राज्य की सरकार के लिए चुनौती बन गए हों। पहली बार 1980 में प्याज की कीमतें चुनावी मुद्दा बनीं। तब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी और कांग्रेस विपक्ष में थी। इंदिरा गांधी चुनाव प्रचार के दौरान प्याज की माला पहनकर घूमीं। आम चुनावों में जनता पार्टी की हार हुई थी। एक और उदाहरण दिल्ली का है, जहां 1998 में प्याज की कीमतों के चलते ही भाजपा ने 3 मुख्यमंत्री बदले, लेकिन यह ऐसा चुनावी मुद्दा बना कि पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।

1980: चुनावी नारा बनाजिस सरकार का कीमत पर जोर नहीं, उसे देश चलाने का आधिकार नहीं

जनता पार्टी केंद्र में थी। प्याज की कीमतें बढ़ गईं। 1980 के आम चुनाव में विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया और इंदिरा गांधी प्याज की माला पहनकर प्रचार करने गईं। चुनावी नारा भी बना कि जिस सरकार का कीमत पर जोर नहीं, उसे देश चलाने का अधिकार नहीं। चुनावी नतीजे आए तो जनता पार्टी की हार हुई और कांग्रेस ने सरकार बनाई। नतीजों के बाद यही कहा गया कि जनता पार्टी प्याज की कीमतों के चलते चुनाव हारी।

1998: भाजपा को सीएम बदलने पड़े, कीमतों पर लगाम नहीं लगी

1998 में दिल्ली भाजपा की सरकार थी और मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री। प्याज की कीमतें बढ़ीं और विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू किया। दबाव इतना बढ़ा कि खुराना को हटाकर साहिब सिंह वर्मा को कमान सौंपी गई। कीमतें फिर भी नहीं घटीं। भाजपा ने एक बार फिर सीएम बदला और इस बार सुषमा स्वराज को मौका दिया गया। प्याज की कीमतों पर काबू पाने के लिए सुषमा ने कई कदम उठाए, लेकिन वे असफल रहीं। आखिरकार प्याज बड़ा चुनावी मुद्दा बना और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।

1998 : कांग्रेसी नेता ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को मिठाई के डिब्बे में भेजी थी प्याज

1998 की दिवाली में महाराष्ट्र में प्याज की भारी किल्लत हो गई और इसकी कीमत बढ़ गई। कांग्रेसी नेता छगन भुजबल ने इस पर तंज कसने के लिए महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को मिठाई के डिब्बे में प्याज रखकर भेजी थी। इससे शर्मिंदा होकर मनोहर जोशी ने राशन कार्ड धारकों को 45 रुपए की प्याज 15 रुपए प्रति किलो में उपलब्ध करवाई थी।

1998 में ही राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी प्याज मुद्दा बना। भाजपा के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने विधानसभा चुनाव हारने के बाद कहा- प्याज हमारे पीछे पड़ा था। इतना ही नहीं 1998 में ही भाजपा के नेतृत्व वाले राजग गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भी प्याज के कारण गिरी थी। वाजपेयी ने कहा था कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में नहीं होती प्याज की कीमतें बढ़ जाती हैं। 

2013 : 15 साल की कांग्रेस सरकार भी प्याज के कारण गिरी

प्याज की बढ़ी कीमतों को मुद्दा बनाकर दिल्ली की सत्ता में आई कांग्रेस की शीला दीक्षित की सरकार भी प्याज की वजह से ही गिर गई थी। 2013 में विधानसभा चुनाव से पहले प्याज की कीमतें बढ़ गईं। तब दिवंगत शीला दीक्षित ने भावुक होकर कहा था, ‘हफ्तों बाद मैंने भिंडी के साथ प्याज खाई है।’ हालांकि, भाजपा ने प्याज की बढ़ती कीमतों को मुद्दा बनाया। दिसंबर 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 15 साल बाद हार गई।

2010 में तत्काल उठाए थे कदम

2010 में भी प्याज का संकट हुआ था। महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्याज उत्पादक इलाकों में अत्यधिक बारिश में फसल बर्बाद हो गई। दिसंबर में दिल्ली में दाम एक ही हफ्ते में 35 रुपए से बढ़कर 80 रुपए तक जा पहुंचे। हाहाकार मचा। प्रदर्शन हुए। सरकार जागी। निर्यात पर रोक लगी। इम्पोर्ट टैक्स में कमी की। पाकिस्तान से प्याज मंगाया। तब जाकर दाम 50 रुपए पर आए।

2019-20 में क्या स्थिति?

केन्द्र सरकार को इस साल जुलाई से अक्टूबर के दौरान 52.06 लाख मीट्रिक टन प्याज के उत्पादन का अनुमान है। यह पिछले साल की तुलना में 26% कम है। पिछले साल इस सीजन में कुल प्याज उत्पादन 69.91 लाख मीट्रिक टन था।

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